श्री ऋद्धि सिद्धि विनायक जी का दूर्वा से पूजन करने की विधि

  श्री ऋद्धि सिद्धि के दाता गणपति महाराज को दूर्वा अर्पण कैसे
करे            श्री गणेशाय नमः


            गजाननम  भूत गणादी  सेवितं कपिथ्जम्बू फल्चारुभाक्ष्नम
उमासुतं शोक विनाश्कार्कम नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम"

श्री गणेश को हरियाली बहुत पंसद है। गणेश जी को प्रदान की गई दूर्वा जातक के जीवन में भी हरियाली यानी कि खुशियों को बढ़ाने वाली होती है। गणेश जी को दूर्वा एक खास तरीके से चढ़ाई जाती है। ये तरीके है - दूर्वा का जोड़ा बनाकर चढ़ाना। 22 दूर्वा को जोड़े से बनाने पर 11 जोड़ा दूर्वा का तैयार हो जाता है। जिसे भगवान गणेश को अर्पित करने से मनोकामना की पूर्ति में सहायक माना गया है 
गणपति महाराज जी को दूर्वा चढ़ाने का मंत्र 
ऊँ गणाधिपाय नमः
ऊँ उमापुत्राय नमः
ऊँ विघ्ननाशनाय नमः
ऊँ विनायकाय नमः
ऊँ ईशपुत्राय नमः
ऊँ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः
ऊँएकदन्ताय नमः
ऊँ इभवक्त्राय नमः
ऊँ मूषकवाहनाय नमः
ऊँ कुमारगुरवे नमः रिद्धि-सिद्धि सहिताय श्री मन्महागणाधिपतये नमः  कहते हुए श्री गणेश को 11 वें दूर्वा का जोड़ा अर्पित करें।   यदि मंत्र बोलने में कठिनाई हो तो यह कहते हुए दूर्वा अर्पित करें।
श्री गणेशाय नमः दूर्वांकुरान् समर्पयामि।

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  गणपति जी को अर्पित की जाने वाली दूर्वा   श्री गणेश को 3 या 5 गांठ वाली दूर्वा अर्पित की जाती है। किसी मंदिर की जमीन में उगी हुई या बगीचे में उगी हुई दूर्वा लेना चाहिए ।
21 दूर्वा को मोली से बांधकर उसमें एक गुड़हल का लाल पुष्प लगा कर श्रीगणेश के मस्तक पर धारण कराना चाहिए । वैसे श्रीगणेश दो दूर्वादल से भी प्रसन्न हो जाते हैं ।

गणेशजी को अति प्रिय भी है दूर्वा। 21 दूर्वा को एकत्र करके एक गांठ में इसे रखा जाता है। इस प्रकार कुल 21 गांठों को गणेशजी के मस्तक पर चढ़ाया जाता है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि दूब की 21 गांठें गणेशजी को चढ़ाने के पीछे क्या कहानी है। आइए जानते हैं पुराणों में उल्लेखित है यह कथा...।
                       पौराणिक कथा 


के मुताबिक एक समय में अनलासुर नाम का एक विशाल दैत्य था। इसके कोप और दहशत से तीनों लोकों में त्राही-त्राही मची थी। अनलासुर ऋषि, मुनियों और जनता को जिंदा ही निगल जाता था। इस विशालकाय दैत्य से तंग आकर देवराज इंद्र समेत कई देवी-देवता एकत्र हुए और सभी ने महादेव से प्रार्थना की कि इस दैत्य के आतंक का खात्म करें।
भगवान शिवजी ने सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों की प्रार्थना स्वीकार की और कहा कि अनलासुर दैत्य का अंत केवल गणेश ही कर पाएंगे। जब गणेशजी ने अनलासुर दैत्य को निगल लिया तो उनके पेट में काफी जलन होने लगी। कई प्रकार के उपाय करने पर भी पेट की जलन शांत नहीं हो रहा था। तभी कश्यप ऋषि ने दूब की 21 गांठ बनाकर गणेश भगवान को खाने को दे दी। जब गणेशजी ने दूब का सेवन किया तो तुरंत ही उनके पेट की जलन शांत हो गई। इसी के बाद से गणेशजी को दूर्वा चढ़ाई जाती है

ॐ गं गणपतये नमः  ॐ गं गणपतये नमः
 श्री सिद्धि विनायक नमो नमः श्री अष्टविनायक नमो नमः


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