श्री अहोई अष्टमी व्रत विधान महत्व पूजा विधि

अहोई माता की पूजा विधि  व महत्व


अहोई अष्टमी व्रत का महत्व क्या है ?

- अहोई अष्टमी व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है

- इस दिन अहोई माता (पार्वती) की पूजा की जाती है

- इस दिन महिलाएं व्रत रखकर अपने संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती हैं

- जिन लोगों को संतान नहीं हो पा रही हो उनके लिए ये व्रत विशेष है

- जिनकी संतान दीर्घायु न होती हो , या गर्भ में ही नष्ट हो जाती हो , उनके लिए भी ये व्रत शुभकारी होता है

- सामान्यतः इस दिन विशेष प्रयोग करने से संतान की उन्नति और कल्याण भी होता है

- ये उपवास आयुकारक और सौभाग्यकारक होता है

                         
           विधि
सुबह के समय जल्दी उठकर स्नान आदि कर लें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

अब घर के मंदिर की दीवार पर गेरू और चावल से अहोई माता यानी मां पार्वती और स्याहु व उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं।

 पूजा के लिए आप चाहें तो बाजार में मिलने वाले पोस्टर का भी इस्तेमाल कर सकती हैं।

 अब एक नया मटका लें उसमें पानी भरकर रखें और उस पर हल्दी से स्वास्तिक बनाएं, अब मटके के ढक्कन पर सिंघाड़े रखें।

 घर में मौजूद सभी बुजुर्ग महिलाओं के साथ मिलकर अहोई माता का ध्यान करें और उनकी व्रत कथा पढ़ें।

सभी महिलाओं के लिए एक-एक स्वच्छ कपड़ा भी रखें।

 कथा के बाद इस कपड़े को उन महिलाओं को भेंट कर दें।

रात के समय सितारों को जल से अर्घ्य दें और फिर ही उपवास को तोड़ें।

कुछ समुदायों में चाँदी की अहोई माता जिसे स्याऊ भी कहते है बनाई व् पूजी जाती है। पूजा के बाद इसे चाँदी के दो मनकों के साथ धागे में गूँथ कर गले में माला की तरह पहना जाता है।

पूजा सम्पन्न होने के बाद महिलाएं अपने परिवार की परंपरा के अनुसार पवित्र कलश में से चंद्रमा अथवा तारों को अर्घ देती हैं। तारों के दर्शन से अथवा चंद्रोदय के पश्चात अहोई माता का व्रत संपन्न होता है।
 

                                     अहोई अष्टमी की कथा 

प्राचीन काल में एक साहूकार था, जिसके सात बेटे और सात बहुएं थी। इस साहूकार की एक बेटी भी थी जो दीपावली में ससुराल से मायके आई थी। दीपावली पर घर को लीपने के लिए सातों बहुएं मिट्टी लाने जंगल में गई तो ननद भी उनके साथ चली गई। साहूकार की बेटी जहां मिट्टी काट रही थी, उस स्थान पर स्याहु (साही) अपने साथ बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए गलती से साहूकार की बेटी की खुरपी के चोट से स्याहु का एक बच्चा मर गया। इस पर क्रोधित होकर स्याहु बोली- मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी।
स्याहु के वचन सुनकर साहूकार की बेटी अपनी सातों भाभियों से एक-एक कर विनती करती हैं कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें। सबसे छोटी भाभी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते हैं वे सात दिन बाद मर जाते हैं। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछा। पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी।
सुरही सेवा से प्रसन्न होती है और उसे स्याहु के पास ले जाती है। रास्ते में थक जाने पर दोनों आराम करने लगते हैं। अचानक साहूकार की छोटी बहू की नजर एक ओर जाती हैं, वह देखती है कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है और वह सांप को मार देती है। इतने में गरूड़ पंखनी वहां आ जाती है और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगता है कि छोटी बहू ने उसके बच्चे को मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच मारना शुरू कर देती है।
छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन्हें स्याहु के पास पहुंचा देती है। वहां स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहू होने का आशीर्वाद देती है। स्याहु के आशीर्वाद से छोटी बहू का घर पुत्र और पुत्र वधुओं से हरा भरा हो जाता है। अहोई का अर्थ एक यह भी होता है ‘अनहोनी को होनी बनाना।’ जैसे साहूकार की छोटी बहू ने कर दिखाया था।

                       श्री बिंदायक जी महाराज की कथा

उस समय की बात है जब भगवान विष्णु जी की  शादी लक्ष्मी जी से तय हुई थी । शादी की खूब तैयारियां की गई। चारो और हर्षो उल्लास का वातावरण था। सारे देवी -देवता को बारात में चलने  के लिए निमंत्रण दिया गया।
सारे देवी -देवता आये तो सब भगवान विष्णु से कहने लगे की गणेश जी को नहीं ले जायेंगे। वे बहुत मोटे हैं वो तो बहुत सारा खाते है। दूंद दूछल्या , सूंड सून्डयाला , ऊखल से पाँव , छाजले से कान , मोटा मस्तक वाले है।
इनको साथ ले जाकर क्या करेंगे , यही रखवाली के लिए छोड़ जाते हैं और विनायक जी को छोड़कर वे सब बारात में चले गए ।
इधर नारद जी ने गणेश जी को भड़का दिया ओर कहा की आज तो महाराज ने आपका बहुत बड़ा अपमान किया है। आप से बारात बुरी लगती इसीलिए आपको साथ नहीं ले गए और छोड़ कर चले गए ।
गणेश जी को क्रोध आ गया और उन्होंने चूहों की आज्ञा दी की सारी जमीन खोखली कर दे। धरती थोथी हो गयी इससे भगवान के रथ के पहिये धंस गए।
बहुत कोशिश करके सब परेशान हो गए किसी भी तरह से पहिये नहीं निकले तो खाती को बुलाया। खाती आया सारा दृश्य देखा और पहिये को हाथ लगा कर बोला  ” जय गजानन्द जी ” और इतने में तुरन्त रथ निकल गया। सब देखते रह गए।
सबको बड़ा आश्चर्य हुआ उन्होंने पूछा कि तुमने गजानन्द जी को क्यों याद किया।
खाती बोला ” गणेश जी को सुमरे बिना कोई काम सिद्ध नहीं होता ” जो भी सच्चे मन से गजानन्द जी को याद करता है उसके सब काम बड़ी आसानी से सिद्ध हो जाते है।
सब सोचने लगे हम तो गणेश जी को ही छोड़ आये। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और एक जने को भेज कर गणेश जी को बुलवाया व गणेश जी से माफ़ी माँगी .
पहले गणेश जी का रिद्धि -सिद्धि से विवाह करवाया फिर भगवान विष्णु का लक्ष्मी जी के साथ हुआ। सभी बहुत ही खुश थे तभी से कोई भी शुभ काम शुरू करने से पहले बिंदायक जी का स्मरण किया जाता है।
जैसे भगवान का काम सिद्ध किया वैसे सबका सिद्ध करना।
        श्री बिंदायक जी महाराज की जय
आरती  अहोई माता जी की
जय अहोई माता जय अहोई माता ।
तुमको निसदिन ध्यावत हरी विष्णु धाता ।।
ब्रम्हाणी रुद्राणी कमला तू ही है जग दाता ।
जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता ।।
तू ही है पाताल बसंती तू ही है सुख दाता ।
कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ।।
जिस घर थारो वास वही में गुण आता ।
कर न सके सोई कर ले मन नहीं घबराता ।।
तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पता ।
खान पान का वैभव तुम बिन नहीं आता ।।
शुभ गुण सुन्दर युक्ता क्षीर निधि जाता ।
रतन चतुर्दश तोंकू कोई नहीं पाता ।।
श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता ।
उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता ।।

 भक्तजनों आप से अनुरोध है कि दान केवल असहाय निर्धन व्यक्ति या दान पात्र संस्था को ही दे आपको प्रभु की कृपा प्राप्त होगी     जय जय श्री हरि विष्णु

Comments

  1. कृष्णा रीवा19 October 2019 at 08:04

    जय श्री अहोई अष्टमी माता आपकी ये पोस्ट बहुत ही महत्वपूर्ण है कृपया आप आगे भी ऐसे ही पोस्ट करते रहे

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