श्री शनिदेव मन्त्र दशा दोष कष्ट निवारणार्थ व पिप्लाद कथा

श्री शनिदेव  दशा दोष कष्ट निवारणार्थ मंत्र पूजन विधि


अपने आराध्य देव शनि का हर दिन पूजा और मंत्र जाप करना ज्यादा सार्थक है | शनिवार को भूल से भी ना खरीदे ये चीजे | जिस पर यह प्रसन्न हो जाये उससे फिर कोई ग्रह अशुभ प्रभाव नही दिखाता है |

शनि देव मंत्र की महिमा

अपने कष्ट-पीड़ाओं और दुखो से मुक्ति प्राप्त करने के लिए निचे लिखे वैदिक मंत्र का रोज  प्रातः सायंकाल में जाप करे |




वैदिक मंत्र

ॐ शं शनैश्चराय नम:

 ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु ‍पीतये। शं यो‍रभि स्रवन्तु न

ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम:

शनि गायत्री मन्त्र

शनि गायत्री मंत्र पाठ : औम कृष्णांगाय विद्य्महे रविपुत्राय धीमहि तन्न: सौरि: प्रचोदयात |


पौराणिक मंत्र :
इस मंत्र के माध्यम से शनिदेव की पूजा जप करें श्री शनिदेव की कृपा अवश्य प्राप्त होगी।

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामी शनैश्चरम्

शनिवार को प्रातः व सायंकाल को पीपल  वृक्ष  के निचे दीपक जरूर जलाये व प्रभु से संकट कष्ट दूर करने के लिए प्रार्थना करे ।

शनिवार के दिन किसी गरीब असहाय व्यक्ति को भोजन करवाये व दान दे या दान पात्र संस्था को श्रद्धा पूर्वक दान दे
 व श्री शनिदेव से संकट व कष्टो के निवारण के लिए प्रार्थना करें ।


शनिदेव व पिप्लाद कथा

पुराणों में वर्णित एक कथा के अनुसार ऋषि कौशिक के पुत्र पिप्पलाद की क्रोध भरी मारक दृष्टि के प्रकोप की वजह से आसमान से शनिदेव सीधा नीचे जमीन पर आ गिरे और उनका एक पैर टूट गया और तब से शनिदेव अपाहिज हो गए

कथा के अनुसार त्रेतायुग में एक बार बहुत भयंकर अकाल पड़ा. ऋषि कौशिक भी उसकी पीड़ा से नहीं बच सके और पत्नी-बच्चों समेत सुरक्षित स्थान की खोज में निकल पड़े. रास्ते में परिवार का भरण-पोषण कठिन जान पड़ने पर उन्होंने अपने एक पुत्र को बीच रास्ते में ही छोड़ दिया. वह बालक बड़ा दुखी हुआ. एक जगह उसे पीपल का पेड़ और उसके नजदीक ही एक तालाब नजर आया. भूख से व्याकुल वह बालक उसी पीपल के पत्तों को खाकर और तालाब से पानी पीकर वहीं अपने दिन बिताने लगा.

एक दिन आकाश गमन करते ऋषि नारद की नजर उसपर पड़ी और उसके साहसी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्होंने उसे भगवान विष्णु की पूजा विधि बताकर पूजा करने की सलाह दी. बालक ने नित्य प्रति पूजा करते हुए भगवान विष्णु को प्रसन्न कर लिया और उनसे योग एवं ज्ञान की शिक्षा लेकर महर्षि बन गया. ऋषि नारद ने उसका नाम पिप्पलाद रखा.

एक दिन जिज्ञासावश महर्षि पिप्पलाद ने नारद से अपने बाल जीवन के कष्टों का कारण पूछा. नारद जी ने पिप्पलाद को बताया कि उसके इस दुख का कारण शनि का मनमानी और आत्माभिमानी भरा रवैया है जिसके कारण सभी देव उससे डरते हैं. यह सुनकर पिप्पलाद को बहुत गुस्सा आया और उसने क्रोध भरी दृष्टि से आसमान में शनि को देखा. पिप्पलाद की उस क्रोध भरी नजर के प्रभाव से शनि घायल होकर जमीन पर गिर पड़े और उनका एक पैर घायल हो गया. पिप्पलाद तब भी शांत नहीं हुए लेकिन इससे पहले कि वह शनि को कोई और नुकसान पहुंचाते, ब्रह्मा जी वहां प्रकट हुए और पिप्पलाद को बताया कि विधि के विधान के अनुसार शनि को अपना काम करना होता है और उनके साथ जो हुआ है उसमें शनि की कोई गलती नहीं थी. ब्रह्मा जी ने पिप्पलाद को आशीर्वाद दिया कि शनिवार के दिन पिप्पलाद का ध्यान कर जो भी शनिदेव की पूजा करेगा उसे शनि के कष्टों से मुक्ति मिलेगी. तब से आज तक शनिवार के दिन शनि ग्रह की शांति के लिए शनिदेव के साथ पीपल की पूजा का भी विधान बन गया.


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