अक्षय नवमी व आंवला नवमी की कथा महत्व व विधि
शुक्ल नवमी को आंवला नवमी या अक्षय नवमी कहा जाता है।
आंवला नवमी उत्तर और मध्य भारत में बड़े पैमाने पर मनाई जाती है।
इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करके उसके नीचे बैठकर भोजन करने का महत्व है। ऐसी मान्यता है कि आंवला नवमी के दिन आंवला के वृक्ष की पूजा करने से घर-परिवार में स्थायी सुख-संपत्ति का वास होता है।
उस परिवार की खुशियां कभी कम नहीं पड़ती, अक्षय रहती है। कई जगह महिलाएं उत्तम संतान सुख की प्राप्ति के लिए भी आंवला नवमी की पूजा और व्रत करती हैं।
आंवला नवमी या अक्षय नवमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन की गलियां छोड़ मथुरा प्रस्थान कर गए थे। इस दिन से उन्होंने अपनी बाल लीलाओं का त्याग कर कर्तव्य के पथ पर कदम रखा था। उत्तरभारत में इस दिन वृंदावन की परिक्रमा प्रारंभ की जाती है। वहीं दक्षिण और पूर्वी भारत में इस दिन से जगद्धात्री महापर्व की शुरुआत होती है।
आंवला नवमी कथा
काशी नगरी में एक व्यापारी और उसकी पत्नी निवास करते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। इसी कारण व्यापारी की पत्नी हमेशा दुखी रहती थी। एक दिन उसे किसी ने कहा कि यदि वह संतान चाहती है तो उसे किसी जीवित बच्चे की बलि भैरव को चढ़ाना होगी। उसने यह बात अपने पति से कही, लेकिन पति को यह बात जरा भी पसंद नहीं आई। चूंकि उसकी पत्नी को संतान की बहुत अधिक लालसा थी, इसलिए उसने पति से छुपाकर और अच्छे-बुरे की परवाह किए बिना एक बच्चा चुराकर उसकी बलि भैरव बाबा को दे दी। इसका गंभीर परिणाम हुआ और व्यापारी की पत्नी को कई रोग हो गए। पत्नी की यह हालत देख व्यापारी दुखी था। उसने इसका कारण पूछा तो पत्नी ने बताया कि बच्चे की बलि के कारण उसकी यह हालत हुए है। यह सुनकर व्यापारी को बहुत क्रोध आया, लेकिन पत्नी की हालत से वह दुखी था। इसलिए उसने उपाय बताया कि वह इस पाप से मुक्ति के लिए गंगा स्नान करे और सच्चे मन से ईश्वर से प्रार्थना करे। व्यापारी की पत्नी ने कई दिनों तक यह किया। इससे प्रसन्न होकर गंगा माता ने एक बूढ़ी औरत के रूप में व्यापारी की पत्नी को दर्शन दिए और कहा कि उसके शरीर के सारे रोग दूर हो जाएंगे, यदि वह कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन वृंदावन में वृत रखकर आंवले के वृक्ष की पूजा करे। व्यापारी की पत्नी ने बड़े विधि-विधान से आंवला नवमी का व्रत-पूजन किया। इससे शीघ्र ही उसके सभी कष्ट दूर हो गए और उसे एक स्वस्थ व सुंदर संतान की प्राप्ति हुई। इसी दिन से महिलाएं सुख-सौभाग्य, रोग मुक्ति और उत्तम संतानसुख की प्राप्ति के लिए आंवला नवमी का व्रत करती हैं।
पूजा की विधि
इस दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर किसी आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। पेड़ के आसपास सफाई करके पेड़ के तने को शुद्ध जल से स्नान करवाया जाता है। फिर उसकी जड़ में कच्चा दूध अर्पित किया जाता है। पेड़ का कुंकुम, हल्दी आदि विभिन्न सामग्रियों से पूजन करके उस पर लाल मौली लपेटते हुए 8 या 108 बार परिक्रमा की जाती है। महिलाएं सुहाग की सामग्री अर्पित करती हैं। इसके बाद पूरा परिवार मिलकर आंवले के पेड़ के समीप बैठकर भोजन करता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिक मास की नवमी तिथि को आंवला नवमी कहते हैं। माना जाता है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी से लेकर पूर्णिमा तक भगवान विष्णु आवंले के पेड़ पर निवास करते हैं।
अक्षय नवमी की कथा
एक बार देवी लक्ष्मी तीर्थाटन पर निकली तो रास्ते में उनकी इच्छा हुई कि भगवान विष्णु और शिव की पूजा की जाय. देवी लक्ष्मी उस समय सोचने लगीं कि एक मात्र चीज़ क्या हो सकती है जिसे भगवान विष्णु और शिव जी पसंदीद करते हों, उसे ही प्रतीक मानकर पूजा की जाय. इस प्रकार काफी विचार करने पर देवी लक्ष्मी को ध्यान पर आया कि धात्री (आँवला )ही ऐसी है जिसमें तुलसी और विल्व(बेल )दोनों के गुण मजूद हैं फलत: इन्हीं की पूजा करनी चाहिए. देवी लक्ष्मी तब धात्री के वृक्ष की पूजा की और उसी वृक्ष के नीचे प्रसाद ग्रहण किया. इस दिन से ही धात्री के वृक्ष की पूजा का प्रचलन हुआ.
मान्यता है कि पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु इस नवमी पूजन का विशेष महत्व है।
अक्षय नवमी पूजन विधि
आंवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में बैठकर पूजन कर उसकी जड़ में दूध देना चाहिए। इसके बाद अक्षत, पुष्प, चंदन से पूजा-अर्चना कर और पेड़ के चारों ओर कच्चा धागा बांधकर कपूर, बाती या शुद्ध घी की बाती से आरती करते हुए सात बार परिक्रमा करनी चाहिए तथा इसकी कथा सुनना चाहिए।पूजा-अर्चना के बाद खीर, पूड़ी, सब्जी और मिष्ठान आदि का भोग लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि आंवला पेड़ की पूजा कर 108 बार परिक्रमा करने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होतीं हैं। अक्षय नवमी के दिन संध्या काल में आंवले के पेड़ के नीचे भोजन बनाकर लोगों को खाना खिलाने से बहुत ही पुण्य मिलता है. ऐसी मान्यता है कि भोजन करते समय थाली में आंवले का पत्ता गिरे तो बहुत ही शुभ माना जाता है साथ ही यह संकेत होता है कि आप वर्ष भर स्वस्थ रहेंगे ।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री नारायण हरि जय राधे राधे राधे राधे
शुक्ल नवमी को आंवला नवमी या अक्षय नवमी कहा जाता है।
आंवला नवमी उत्तर और मध्य भारत में बड़े पैमाने पर मनाई जाती है।
इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करके उसके नीचे बैठकर भोजन करने का महत्व है। ऐसी मान्यता है कि आंवला नवमी के दिन आंवला के वृक्ष की पूजा करने से घर-परिवार में स्थायी सुख-संपत्ति का वास होता है।
उस परिवार की खुशियां कभी कम नहीं पड़ती, अक्षय रहती है। कई जगह महिलाएं उत्तम संतान सुख की प्राप्ति के लिए भी आंवला नवमी की पूजा और व्रत करती हैं।
आंवला नवमी या अक्षय नवमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन की गलियां छोड़ मथुरा प्रस्थान कर गए थे। इस दिन से उन्होंने अपनी बाल लीलाओं का त्याग कर कर्तव्य के पथ पर कदम रखा था। उत्तरभारत में इस दिन वृंदावन की परिक्रमा प्रारंभ की जाती है। वहीं दक्षिण और पूर्वी भारत में इस दिन से जगद्धात्री महापर्व की शुरुआत होती है।
आंवला नवमी कथा
काशी नगरी में एक व्यापारी और उसकी पत्नी निवास करते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। इसी कारण व्यापारी की पत्नी हमेशा दुखी रहती थी। एक दिन उसे किसी ने कहा कि यदि वह संतान चाहती है तो उसे किसी जीवित बच्चे की बलि भैरव को चढ़ाना होगी। उसने यह बात अपने पति से कही, लेकिन पति को यह बात जरा भी पसंद नहीं आई। चूंकि उसकी पत्नी को संतान की बहुत अधिक लालसा थी, इसलिए उसने पति से छुपाकर और अच्छे-बुरे की परवाह किए बिना एक बच्चा चुराकर उसकी बलि भैरव बाबा को दे दी। इसका गंभीर परिणाम हुआ और व्यापारी की पत्नी को कई रोग हो गए। पत्नी की यह हालत देख व्यापारी दुखी था। उसने इसका कारण पूछा तो पत्नी ने बताया कि बच्चे की बलि के कारण उसकी यह हालत हुए है। यह सुनकर व्यापारी को बहुत क्रोध आया, लेकिन पत्नी की हालत से वह दुखी था। इसलिए उसने उपाय बताया कि वह इस पाप से मुक्ति के लिए गंगा स्नान करे और सच्चे मन से ईश्वर से प्रार्थना करे। व्यापारी की पत्नी ने कई दिनों तक यह किया। इससे प्रसन्न होकर गंगा माता ने एक बूढ़ी औरत के रूप में व्यापारी की पत्नी को दर्शन दिए और कहा कि उसके शरीर के सारे रोग दूर हो जाएंगे, यदि वह कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन वृंदावन में वृत रखकर आंवले के वृक्ष की पूजा करे। व्यापारी की पत्नी ने बड़े विधि-विधान से आंवला नवमी का व्रत-पूजन किया। इससे शीघ्र ही उसके सभी कष्ट दूर हो गए और उसे एक स्वस्थ व सुंदर संतान की प्राप्ति हुई। इसी दिन से महिलाएं सुख-सौभाग्य, रोग मुक्ति और उत्तम संतानसुख की प्राप्ति के लिए आंवला नवमी का व्रत करती हैं।
पूजा की विधि
इस दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर किसी आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। पेड़ के आसपास सफाई करके पेड़ के तने को शुद्ध जल से स्नान करवाया जाता है। फिर उसकी जड़ में कच्चा दूध अर्पित किया जाता है। पेड़ का कुंकुम, हल्दी आदि विभिन्न सामग्रियों से पूजन करके उस पर लाल मौली लपेटते हुए 8 या 108 बार परिक्रमा की जाती है। महिलाएं सुहाग की सामग्री अर्पित करती हैं। इसके बाद पूरा परिवार मिलकर आंवले के पेड़ के समीप बैठकर भोजन करता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिक मास की नवमी तिथि को आंवला नवमी कहते हैं। माना जाता है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी से लेकर पूर्णिमा तक भगवान विष्णु आवंले के पेड़ पर निवास करते हैं।
अक्षय नवमी की कथा
एक बार देवी लक्ष्मी तीर्थाटन पर निकली तो रास्ते में उनकी इच्छा हुई कि भगवान विष्णु और शिव की पूजा की जाय. देवी लक्ष्मी उस समय सोचने लगीं कि एक मात्र चीज़ क्या हो सकती है जिसे भगवान विष्णु और शिव जी पसंदीद करते हों, उसे ही प्रतीक मानकर पूजा की जाय. इस प्रकार काफी विचार करने पर देवी लक्ष्मी को ध्यान पर आया कि धात्री (आँवला )ही ऐसी है जिसमें तुलसी और विल्व(बेल )दोनों के गुण मजूद हैं फलत: इन्हीं की पूजा करनी चाहिए. देवी लक्ष्मी तब धात्री के वृक्ष की पूजा की और उसी वृक्ष के नीचे प्रसाद ग्रहण किया. इस दिन से ही धात्री के वृक्ष की पूजा का प्रचलन हुआ.
मान्यता है कि पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु इस नवमी पूजन का विशेष महत्व है।
अक्षय नवमी पूजन विधि
आंवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में बैठकर पूजन कर उसकी जड़ में दूध देना चाहिए। इसके बाद अक्षत, पुष्प, चंदन से पूजा-अर्चना कर और पेड़ के चारों ओर कच्चा धागा बांधकर कपूर, बाती या शुद्ध घी की बाती से आरती करते हुए सात बार परिक्रमा करनी चाहिए तथा इसकी कथा सुनना चाहिए।पूजा-अर्चना के बाद खीर, पूड़ी, सब्जी और मिष्ठान आदि का भोग लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि आंवला पेड़ की पूजा कर 108 बार परिक्रमा करने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होतीं हैं। अक्षय नवमी के दिन संध्या काल में आंवले के पेड़ के नीचे भोजन बनाकर लोगों को खाना खिलाने से बहुत ही पुण्य मिलता है. ऐसी मान्यता है कि भोजन करते समय थाली में आंवले का पत्ता गिरे तो बहुत ही शुभ माना जाता है साथ ही यह संकेत होता है कि आप वर्ष भर स्वस्थ रहेंगे ।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री नारायण हरि जय राधे राधे राधे राधे


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