🌺 अपरा (अचला ) एकादशी का माहात्म्य 🌺
भगवान #श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! यह एकादशी ‘अचला’ तथा’ अपरा दो नामों से जानी जाती है। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ #कृष्ण पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी है, क्योंकि यह अपार धन देने वाली है। जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, वे संसार में प्रसिद्ध हो जाते हैं।
इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है। अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, भूत योनि, दूसरे की निंदा आदि के सब पाप दूर हो जाते हैं। इस व्रत के करने से परस्त्री गमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, झूठे शास्त्र पढ़ना या बनाना, झूठा ज्योतिषी बनना तथा झूठा वैद्य बनना आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
जो क्षत्रिय युद्ध से भाग जाए वे नरकगामी होते हैं, परंतु #अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करते हैं फिर उनकी निंदा करते हैं वे अवश्य नरक में पड़ते हैं। मगर अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी इस पाप से मुक्त हो जाते हैं।
जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक #पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है, वही अपरा #एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। मकर के सूर्य में प्रयागराज के स्नान से, शिवरात्रि का व्रत करने से, सिंह राशि के बृहस्पति में गोमती नदी के स्नान से, कुंभ में केदारनाथ के दर्शन या बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र के स्नान से, स्वर्णदान करने से अथवा अर्द्ध प्रसूता गौदान से जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है।
यह व्रत पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए अग्नि, पापरूपी अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान, मृगों को मारने के लिए सिंह के समान है। अत: मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान का पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर विष्णु लोक को जाता है।
अपरा एकादशी का पुण्य अपार है. कहते हैं कि इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वह भवसागर को तर जाता है. मान्यता है कि इस दिन 'विष्णुसहस्त्रानम्' का पाठ करे,, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय,, का जाप करे से सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्णु की विशेष कृपा बरसती है. जो लोग एकादशी का व्रत नहीं कर रहे हैं उन्हें भी इस दिन भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए और चावल का सेवन नहीं करना चाहिए.
🌻अपरा एकादशी की पूजन विधि 🌻
एकादशी से एक दिन पूर्व ही व्रत के नियमों का पालन करें.
अपरा एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करें.
इसके बाद स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें व्रत का संकल्प लें.
अब घर के मंदिर में भगवान विष्णु और बलराम की प्रतिमा, फोटो दीपक प्रज्वलित करें
- इसके बाद विष्णु की प्रतिमा को अक्षत, फूल, मौसमी फल, नारियल और मेवे चढ़ाएं.
विष्णु की पूजा करते वक्त तुलसी के पत्ते अवश्य रखें.
इसके बाद धूप दिखाकर श्री हरि विष्णु की आरती उतारें.
अब सूर्यदेव को जल अर्पित करें.
एकादशी की कथा सुनें या सुनाएं.
व्रत के दिन निर्जला व्रत करें.
शाम के समय तुलसी के पास गाय के घी का एक दीपक जलाएं .
रात के समय सोना नहीं चाहिए. भगवान का भजन-कीर्तन करना चाहिए.
अगले दिन पारण के समय किसी ब्राह्मण या गरीब को यथाशक्ति भोजन कराए और दक्षिणा देकर विदा करें.
- इसके बाद अन्न और जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें.
🌹अपरा एकादशी व्रत कथा 🌹
अपरा एकादशी की अनेक पौराणिक कथाएं हैं.
इस कथा के अनुसार किसी राज्य में महीध्वज नाम का एक बहुत ही धर्मात्मा राजा था. राजा महीध्वज जितना नेक था उसका छोटा भाई वज्रध्वज उतना ही पापी था. वज्रध्वज महीध्वज से द्वेष करता था और उसे मारने के षड्यंत्र रचता रहता था. एक बार वह अपने मंसूबे में कामयाब हो जाता है और महीध्वज को मारकर उसे जंगल में फिंकवा देता है और खुद राज करने लगता है. अब असामयिक मृत्यु के कारण महीध्वज को प्रेत का जीवन जीना पड़ता है. वह पीपल के पेड़ पर रहने लगता है. उसकी मृत्यु के पश्चात राज्य में उसके दुराचारी भाई से तो प्रजा दुखी थी ही साथ ही अब महीध्वज भी प्रेत बनकर आने जाने वाले को दुख पंहुचाते. लेकिन उसके पुण्यकर्मों का सौभाग्य कहिए कि उधर से एक पंहुचे हुए ऋषि गुजर रहे थे. उन्हें आभास हुआ कि कोई प्रेत उन्हें तंग करने का प्रयास कर रहा है. अपने तपोबल से उन्होंने उसे देख लिया और उसका भविष्य सुधारने का जतन सोचने लगे. सर्वप्रथम उन्होंने प्रेत को पकड़कर उसे अच्छाई का पाठ पढ़ाया फिर उसके मोक्ष के लिए स्वयं ही अपरा एकादशी का व्रत रखा और संकल्प लेकर अपने व्रत का पुण्य प्रेत को दान कर दिया. इस प्रकार उसे प्रेत जीवन से मुक्ति मिली और बैकुंठ गमन कर गया.
अन्य मतो के अनुसार यह कथा के अनुसार एक बार एक राजा ने अपने राज्य में एक बहुत ही मनमोहक उद्यान तैयार करवाया. इस उद्यान में इतने मनोहर पुष्प लगते कि देवता भी आकर्षित हुए बिना नहीं रह सके और वे उद्यान से पुष्प चुराकर ले जाते. राजा चोरी से परेशान, लगातार विरान होते उद्यान को बचाने के सारे प्रयास विफल नजर आ रहे थे. अब राजपुरोहितों को याद किया गया. सभी ने अंदाज लगाया कि है तो किसी दैविय शक्ति का काम किसी इंसान की हिम्मत तो नहीं हो सकती उन्होंने सुझाव दिया कि भगवान श्री हरि के चरणों में जो पुष्प हम अर्पित करते हैं उन्हें उद्यान के चारों और डाल दिया जाएं. देखते हैं बात बनती है या नहीं.
ॐ नारायण हरि
देवता और अप्सराएं नित्य की तरह आए लेकिन दुर्भाग्य से एक अप्सरा का पैर भगवान विष्णु को अर्पित किये पुष्प पर पड़ गया जिससे उसके समस्त पुण्य समाप्त हो गए और वह अन्य साथियों के साथ उड़ान न भर सकी. सुबह होते ही इस अद्वितीय युवती को देखकर राजा को खबर की गई. राजा भी देखते ही सब भूल कर मुग्ध हो गए. अप्सरा ने अपना अपराध कुबूल करते हुए सारा वृतांत कह सुनाया और अपने किए पर पश्चाताप किया. तब राजा ने कहा कि हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं. तब उसने कहा कि यदि आपकी प्रजा में से कोई भी ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का उपवास रखकर उसका पुण्य मुझे दान कर दे तो मैं वापस लौट सकती हूं.
राजा ने प्रजा में घोषणा करवा दी ईनाम की रकम भी तय कर दी, लेकिन कोई उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं मिली. राजा पुरस्कार की राशि बढाते-बढ़ाते आधा राज्य तक देने पर आ गया लेकिन कोई सामने नहीं आया. किसी ने एकादशी व्रत के बारे में तब तक सुना भी नहीं था. परेशान अप्सरा ने चित्रगुप्त को याद किया तब अपने बही खाते से देखकर जानकारी दी कि इस नगर में एक सेठानी से अंजाने में एकादशी का व्रत हुआ है यदि वह संकल्प लेकर व्रत का पुण्य तुम्हें दान कर दे तो बात बन सकती है. उसने राजा को यह बात बता दी.
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
राजा ने ससम्मान सेठ-सेठानी को बुलाया. पुरोहितों द्वारा संकल्प करवाकर सेठानी ने अपने व्रत का पुण्य उसे दान में दे दिया, जिससे अप्सरा राजा व प्रजा का धन्यवाद कर स्वर्गलौट गई. वहीं अपने वादे के मुताबिक सेठ-सेठानी को राजा ने आधा राज्य दे दिया. राजा अब तक एकादशी के महत्व को समझ चुका था उसने आठ से लेकर अस्सी साल तक राजपरिवार सहित राज्य के सभी स्त्री-पुरुषों के लिए वर्ष की प्रत्येक एकादशी का उपवास अनिवार्य कर दिया
श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवाय
राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे कृष्ण
जय जय सियाराम जय जय सियाराम जय जय सियाराम
आप से अनुरोध है घर पर परिवार के साथ रहे । #कोरोना #वायरस से बचाव के लिए बार बार साबुन हाथ धोये , यदि घर से बाहर जाना पड़े जरूरी कार्य वश तो मुख पर मास्क लगाकर ही आये , भीड़ भाड़ वाले स्थान पर जाने बचें , अन्य लोगों से उचित दूरी बनाए रखे , हाथो को मुख ,नाक , आखों पर न लगाएं । सर्दी , जुकाम ,बुखार होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाए । #सरकार के दिशा निर्देशो का पालन करें । आपके व आपके परिवार के उत्तम स्वास्थ्य के लिए श्री #दक्षिणामुखी #पंचमुखी #हनुमानजी से कामना करते है ।
जय जय सियाराम जय जय #सियाराम

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